Thursday, 16 August 2012

बेतरतीब



सुनो!
आज फुरसत के पलों में 
तुम्हारी अलमारी खोलकर बैठ गई
कि पुराने खत पढ़ूं,
उपहारों में बसी 
हमारी यादों की महक महसूस करूं,
और निहारूं उन लम्हों की तस्वीरों को,
पर 
आज मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा है,
मन कर रहा है तुमसे बदला लूं उस डांट का,
जब हमारी शादी के कुछ दिनो बाद
मैने हमारे एलबम्स,खत और उपहार
तुम्हारी अलमारी के ऊपर के खाने से हटाकर
नीचे के खाने में रख दी थी,
और 
तुमने मुझे गुस्से से कहा था कि,
"तुम्हे क्या पता इन चीजों की क्या अहमियत है मेरे लिए
मेरी यादो की जगह बदलने की कोई जरूरत नही है तुम्हे"
उसके बाद मैनें कभी जगह नही बदली, 
न तुम्हारी चीजों की,
न तुम्हारी भावनाओं की,
और 
आज देखो तुम कितने लापरवाह हो गए हो,
तुमने उन यादो को 
कितना "बेतरतीब" कर रखा है,..
जबकि तुम जानते हो कि तुम्हे रहना होगा,
इन्ही यादों के सहारे,..
मेरे बिना,.......मेरे बाद,......प्रीति


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