Sunday, 1 July 2012

क्योंकि अब मैं भी मां जो हूं


आज एक अजीब सा सपना देखा मैंने

मैने देखा कि मेरी मां ने मेरी शरारतों से तंग आकर, 
मेरे पैर की वो छनछन वाली पायल में,
एक बड़ी सी रस्सी बांधकर मुझे आंगन में छोड़ दिया,
वही हमारा पुराना घर जिससे तुम्हारा आंगन सिर्फ दस कदम पर था,
मैं खुशी से ठुमकती इतराती पूरे आंगन भर चहकती रही,..

तभी अचानक सड़क पर खिलौने वाला आया,
और मैं दरवाजे की तरफ लपकी,
और धड़ाम से गिर पड़ी,
रोती हुई फिर उठी और फिर
मैं देहरी तक तो पहुंचती पर देहरी लांघ न पाती,,..

तब मैं समझ जाती के मेरे पैर बंधे हैं,
मैं जोर जोर से रोती और पूरा जोर लगाती 
उस बंधन से आजाद होन के लिए,
तब मां कुछ और खिलौने और टाफियां लाती,
मैं फिर हंसती और खेल मे लग जाती,...

अचानक  मेरी नींद खुल गई,
पर मैं उस एहसास से बाहर न निकल पाई,
शायद ये सपना नही एक कल्पना थी,
क्यूंकि मेरी मां ने कभी नहीं बांधा रस्सी से,
यूं ही उसके बंधन बहुत मजबूत थे,..

या बचपन मे सुनी दादी मां की उस कहानी का अंश,
जिसमें कान्हा को यशोदा ने बांधा था,
पता नही जो देखा वो क्या था पर,. ,..
अब लग रहा है कि मैने शायद आज 
वास्तविकता की एक झलक देखी है,..

आज भी मैं यू ही पूरे आंगन में खुशियां बिखेरती हूं
और आज भी अपने सपनों और ख्वाहिशों के कारवां को
मन की गली से गुजरता देखती हूं,  
तो दौड़ पड़ती हूं उसे पकड़ लेने को
पर आज भी देहरी के पार जाने के पहले ही गिर पड़ती हूं,..

पर ये बंधन जो अब है जो पैरों में
वो सिर्फ मेरी मां ने नहीं बांधे,
ये बंधन तो है रूढ़िवादिता और समाज के नियमों के,
कुछ संस्कारों के और कुछ जिम्मेदारियों के,
जो सिर्फ लादी नही गई मैंने खुद भी ओढ़ी है,...

मन कहता है एक बात तुमसे भी कहूं,
गांव के पुराने घर में जो चंद कदमों का फासला था,
वो तो अब और भी कम लगेगा न?
हमारे कदम बड़े जो हो गए हैं,
पर अब भी बंधन ममता की डोर से ज्यादा मजबूत हैं,...

क्योंकि अब मैं भी मां जो हूं,.........प्रीति

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