Saturday, 28 April 2012

वही पुरानी किताब


मेरी एक बहुत पुरानी 
पर जान से प्यारी किताब
जिसमें लिख रखे हैं मैंने 
अपने कई पुराने हिसाब,

कुछ राज़ कुछ लम्हे 
और कुछ पराए कुछ अपने
कुछ यादें कुछ बाते 
और कुछ मेरे अधूरे सपने

अकसर निकाल कर 
पढ़ लिया करती हूं मैं  इसे
और दोहरा लिया करती हूं 
मैं सारे अनुभव अपने,

बहुत सुकुन मिलता है 
है ये मेरे बचपन की साथी,
इसे सब कुछ बताकर 
और अपने गले से लगाकर

सालों से संभालकर रखा है 
इसने मुझे और मैंने इसे
अब इसके पन्ने पीले हुए,
फट कर अब बिखरने लगे

एक रात मैं इसको थामे हुए 
सोचती रही कैसे संभालूं इसे
आ गए आंसू आंखो मे मेरी 
जिऊंगी कैसे मैं खोकर इसे

बदल दिया करती थी जिल्द 
इसलिए कि ये सलामत रहे
पर है नश्वर सब ये समझा 
जिल्द से भी उम्र ढकती नही

तभी मन मे ये बात आई 
जो शब्द इसमें मैंने लिखे
मेरा वजूद मेरे भाव हैं ये 
जो हैं मुझको इसमें दिखे

क्यूं न फिर से लिखूं वही शब्द 
वही अर्थ और वही भाव
बस बदल दू ये पीले पन्ने 
उम्र की मार से जो बिखरने लगे

फिर किया वही जो सोचा मैंने
पर काम जब ये पूरा हुआ
तब मैंने ये महसूस किया 
कि कुछ भी पहले जैसा न रहा

चाहे शब्द और भाव न बदले 
पर वक्त ने सारे मायने बदल दिए
मैं सोती हूं बिखरे पन्नों की 
वही पुरानी किताब सिरहाने लिए,.........प्रीति

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