Sunday, 27 November 2011

लिखो रेत पर ही


लिखो रेत पर ही 
अपनी
हंसी और रूदन
खुशी और गम
न करो परवाह कि चलेगी हवा
और बिखेर देगी तुम्हारी
यादें और सपनें
मिट जाए या रच-बस जाए
तुम्हारे नाम और पैगाम पर तुम,
लिखो रेत पर ही।
क्योंकि
मैं
बनकर आऊंगी
समदंर की लहर
और
समेट लूंगी
अपने अंदर तुम्हारे हर जज्बात क
इसलिए 
तुम,
लिखो रेत पर ही।.......प्रीति

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