Monday, 2 July 2018

धीरे चलो,..

ख्वाहिशों धीरे चलो वो सामने ही छल पड़ा है
गिर न जाना दौड़ में तुम सिलसिला ये चल पड़ा है

सजग हो कर तुम चलो पर साहस सदा ही साथ रखना
याद रखना हर कदम पर छुप छुपा कर खल पड़ा है

शीत की लहरें चली है देखना धोखा न खाना
आग ईर्ष्या की उठी है और घर ही जल पड़ा है

आसमां से कुछ सितारे झांकते है रात सारी
आज की पावन धरा पर आने वाला कल पड़ा है

चाँद की बिखरी छटा पर रात रानी खिल उठी है
राह तकता रविकिरण की आतुर कमल दल पड़ा है

लोग कहते हैं समय की ही सदा रहती कमी है
पर सफलता के सफर में राह तकता पल पड़ा है

फैसले की है घड़ी देखो न मन विचलित करो तुम
'प्रीत' की है रीत ये तो हर कदम पर हल पड़ा है

डॉ. प्रीति सुराना

0 comments:

Post a Comment